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पुष्य नक्षत्र

पुष्य 27 नक्षत्रों में आठवाँ नक्षत्र है और कर्क 3°20′–16°40′ तक फैला है। इसका ग्रह-स्वामी शनि है, इसलिए जन्म के समय चंद्रमा यहाँ हो तो विंशोत्तरी दशा शनि की महादशा से शुरू होती है, जिसकी पूरी अवधि 19 वर्ष है। इसके अधिष्ठाता देवता बृहस्पति हैं, प्रतीक गाय का थन है, और चारों चरणों के नामाक्षर हु, हे, हो, ड हैं।

पुष्य नक्षत्र का संदर्भ विवरण

संस्कृत नाम
पुष्य
क्रम
27 में 8
निरयन विस्तार
कर्क 3°20′–16°40′
राशि
कर्क
ग्रह-स्वामी (विंशोत्तरी)
शनि — 19 वर्ष की दशा
अधिष्ठाता देवता
बृहस्पति
प्रतीक
गाय का थन
गण
देव
योनि
मेष (भेड़), नर
नाड़ी
मध्य
मुहूर्त वर्ग
क्षिप्र (लघु)
नामाक्षर
हु, हे, हो, ड

चारों चरण

चरणविस्तारनवांशनामाक्षर
1कर्क 3°20′–6°40′सिंहहु
2कर्क 6°40′–10°00′कन्याहे
3कर्क 10°00′–13°20′तुलाहो
4कर्क 13°20′–16°40′वृश्चिक

विस्तार मानक 27 भाग वाले निरयन विभाजन पर आधारित है (हर नक्षत्र 13°20′, हर चरण 3°20′)। स्वामी विंशोत्तरी क्रम के अनुसार हैं; गण, योनि, नाड़ी और नामाक्षर सामान्य अवकहड़ा चक्र से लिए गए हैं। क्षेत्रीय पंचांगों में प्रतीक और अक्षरों की वर्तनी कभी-कभी भिन्न होती है।

पुष्य के देवता, प्रतीक और अर्थ

पुष्य, यानी ‘पोषण करने वाला’, के अधिष्ठाता देवता देवगुरु बृहस्पति हैं, जबकि विंशोत्तरी स्वामी शनि हैं — ज्ञान और अनुशासन का अनोखा मेल। गाय का थन निरंतर पोषण का प्रतीक है। अनेक पंचांग पुष्य को रोज़मर्रा के आरंभ के लिए सबसे शुभ नक्षत्र कहते हैं, और गुरु-पुष्य व रवि-पुष्य योग ख़रीदारी और अध्ययन के लिए विशेष रूप से खोजे जाते हैं।

जन्म कुंडली में पुष्य

जन्म के समय चंद्रमा पुष्य में हो तो यही आपका जन्म नक्षत्र है — इसी से नामाक्षर, विंशोत्तरी दशा का क्रम और कुंडली मिलान तय होते हैं। पुष्य का स्वामी शनि है और यह कर्क में स्थित है, इसलिए फल पढ़ते समय शनि के साथ राशि-स्वामी (चंद्रमा) को भी देखा जाता है। लग्न या कोई अन्य ग्रह पुष्य में हो तो वही प्रतीक उस पर लागू होता है, पर फल उस ग्रह के बल, भाव और दृष्टियों पर निर्भर करता है; नक्षत्र किसी स्थिति को सूक्ष्म बनाता है, उसे पलटता नहीं।

मुहूर्त: पुष्य किन कामों के लिए चुना जाता है

मुहूर्त ग्रंथों में यह क्षिप्र (लघु) नक्षत्र है, जो व्यापार, अध्ययन, छोटी यात्रा और नया कौशल सीखने जैसे शीघ्र कामों के लिए उपयुक्त है। परंपरा एक उल्लेखनीय अपवाद रखती है: विवाह मुहूर्त के लिए पुष्य सामान्यतः नहीं लिया जाता। पूरा मुहूर्त फिर भी तिथि, वार, स्थानीय सूर्योदय और व्यक्तिगत कुंडली देखता है, इसलिए केवल नक्षत्र से तारीख तय नहीं होती।

कुंडली मिलान में गण, योनि और नाड़ी

पुष्य का गण देव, योनि मेष (भेड़), नर और नाड़ी मध्य है। अष्टकूट गुण मिलान में ये तीनों गण कूट (6 अंक), योनि कूट (4 अंक) और नाड़ी कूट (8 अंक) में जाते हैं — कुल 36 में से 18 अंक। ये दोनों व्यक्तियों के जन्म नक्षत्रों की तुलना करते हैं, इसलिए अकेले किसी व्यक्ति का वर्णन नहीं करते, और किसी एक कूट में कम अंक को फैसला नहीं, पूरी कुंडली के संदर्भ में तौला जाता है।

आपकी कुंडली में इसका क्या अर्थ है

पुष्य का सामान्य विवरण यह नहीं बता सकता कि आपकी कुंडली में वहाँ कौन सा ग्रह है, वह किस भाव का स्वामी है या कौन सी दशा चल रही है। अपनी मुफ़्त कुंडली बनाकर देखें कि पुष्य आपके लिए कहाँ पड़ता है, फिर उसी स्थिति के बारे में AI ज्योतिषी से पूछें — इस पेज को निजी भविष्यवाणी न मानें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पुष्य नक्षत्र का स्वामी कौन है?+

विंशोत्तरी पद्धति में पुष्य का स्वामी शनि है। यदि आपका चंद्रमा पुष्य में है तो दशा क्रम शनि से शुरू होता है, जिसकी पूरी अवधि 19 वर्ष है; जन्म के समय शेष अवधि इस पर निर्भर करती है कि चंद्रमा नक्षत्र में कितना आगे बढ़ चुका था।

पुष्य नक्षत्र के नामाक्षर क्या हैं?+

चारों चरणों के अक्षर क्रम से हु, हे, हो, ड हैं — हर चरण का एक। चरण जन्म के समय चंद्रमा की सटीक डिग्री से तय होता है, इसलिए जन्म समय से पता चलता है कि कौन सा अक्षर लागू है; बहुत से परिवार चारों को ही उपलब्ध मानते हैं।

पुष्य नक्षत्र किस राशि में है?+

पुष्य कर्क 3°20′–16°40′ तक फैला है। चारों चरण एक ही राशि में हैं, इसलिए इसमें कहीं भी चंद्रमा हो तो चंद्र राशि वही रहती है।

क्या पुष्य शुभ या अशुभ नक्षत्र है?+

कोई भी नक्षत्र अपने आप में शुभ या अशुभ नहीं होता। मुहूर्त ग्रंथ पुष्य को क्षिप्र (लघु) नक्षत्र मानते हैं, जो बताता है कि यह परंपरागत रूप से किस प्रकार के काम के लिए उपयुक्त है — इसमें जन्मे व्यक्ति का मूल्य नहीं। फल वहाँ स्थित ग्रह, उसके भाव और चल रही दशा पर निर्भर करता है।

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यह सामान्य संदर्भ है; AI ज्योतिषी उत्तर देने से पहले आपकी गणना की हुई कुंडली पढ़ता है।

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